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होली है

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होली है

 

मन से मन भी मिल जाये , तन से तन भी मिल जाये
प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

 

मौसम आज रंगों का छायी अब खुमारी है
चलों सब एक रंग में हो कि आयी आज होली है

 

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज
यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली है

 

क्या जीजा हों कि साली हों ,देवर हो या भाभी हो
दिखे रंगनें में रंगानें में , सभी मशगूल होली है

 

ना शिकबा अब रहे कोई , ना ही दुश्मनी पनपे
गले अब मिल भी जाओं सब, आयी आज होली है

 

प्रियतम क्या प्रिया क्या अब सभी रंगने को आतुर हैं
चलो हम भी बोले होली है तुम भी बोलो होली है .

 

मदन मोहन सक्सेना

 

 

 

कैसी सोच

कैसी सोच अपनी है किधर हम जा रहें यारों
गर कोई देखना चाहें बतन मेरे बो आ जाये

तिजोरी में भरा धन है मुरझाया सा बचपन है
ग़रीबी भुखमरी में क्यों जीबन बीतता जाये

ना करने का ही ज़ज्बा है ना बातों में ही दम दीखता
हर एक दल में सत्ता की जुगलबंदी नजर आयें .

कभी बाटाँ धर्म ने है कभी जाति में खो जाते
हमारें रहनुमाओं  का, असर सब पर नजर आये

ना खाने को ना पीने को ,ना दो पल चैन जीने को
ये कैसा तंत्र है यारों , ये जल्दी से गुजर जाये

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

शिब और शिबरात्रि (धार्मिक मान्यताएँ )

समाजबाद के इस दौर में

समाजबाद के इस दौर में

अपनी अपनी मांगों के समर्थन में
डॉक्टर हड़ताल पर
सूनसान बीरान पड़े अस्पताल
लचर ब्यबस्था
पिटने को मजबूर लाचार डॉक्टर
बेहाल मरीज
मेडिकल सुबिधा न मिलने से मरीजों की मौत
आम जनता और परिजन सब कुछ सहने को मजबूर
हठधर्मिता को अपनाये प्रशासन
बिधायक और पुलिस अफसर पर कार्यबाही
अभी भी इंतजार का रही है
समाजबाद के इस दौर में
कहतें हैं न कि
जिसकी लाठी उसकी भैंस
और अब तो लाठी भी उनकी है और भैस भी
लाठी के आगे सब मजबूर है
चाहें बह रामदेब के आंदोलन कर्मी हों
या फिर अन्ना हज़ारे के आंदोलन कर्मी हों
या फिर बिकलांग ही क्यों न हों
डॉक्टर ,शिक्षक या बकील कोई भी
पुलिस की लाठी के आगे कब तक टिकेगा
जब लाठी को माननीय का समर्थन हो

मदन मोहन सक्सेना

शहर में ठिकाना

शहर में ठिकाना

जब से मैंने गाँव क्या छोड़ा
शहर में ठिकाना खोजा
पता नहीं आजकल
हर कोई मुझसे
आँख मिचौली का खेल क्यों खेला  करता है
जिसकी जब जरुरत होती है
गायब मिलता है
और जब जिसे नहीं होना चाहियें
जबरदस्ती कब्ज़ा जमा लेता है
कल की ही बात है
मेरी बहुत दिनों के बात उससे मुलाकात हुयी
सोचा गिले शिक्बे दूर कर लूं
पहले गाँव में तो उससे रोज का मिलना जुलना था
जबसे इधर क्या आया
या कहिये दीबारों के बीच आकर फंस गया
पूछा
क्या बात है
आजकल आती नहीं हो इधर।
पहले तो आंगन भर-भर आती थी।
दादी की तरह छत पर पसरी रहती थी हमेशा।
पड़ोसियों ने अपनी इमारतों की दीवार क्या ऊँची की
तुम तो इधर का रास्ता ही भूल गयी।
अक्सर सुबह देखता हूं
पड़ी रहती हो
आजकल उनके छज्जों पर
हमारी छत तो अब तुम्हें सुहाती ही नहीं ना
लेकिन याद रखो
ऊँची इमारतों के ऊँचे लोग
बड़ी सादगी से लूटते हैं
फिर चाहे वो इज्जत हो या दौलत।
महीनों के  बाद मिली हो
इसलिए सारी शिकायतें सुना डाली
उसने कुछ बोला नहीं
बस हवा में खुशबु घोल कर
खिड़की के पीछे चली गई
सोचा कि उसे पकड़कर आगोश में भर लूँ
धत्त तेरी की
फिर गायब
ये महानगर की धूप भी न
बिलकुल तुम पर गई है
हमेशा आँख मिचौली का खेल खेल करती है
और मैं न जाने क्या क्या सोचने लग गया
 

 मदन मोहन सक्सेना

ग़ज़ल

मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों 
मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है .


किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे 
जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है  ..

चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा है
तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है …


किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कहदें हम 
 जरुरत पर सभी का जब हुलिया बदल जाता है ….

दिल भी यार पागल है ना जाने दीन दुनिया को 
किसी पत्थर की मूरत पर अक्सर मचल जाता है …..

क्या बताएं आपको हम अपने दिल की दास्ताँ 
जितना दर्द मिलता है ये उतना संभल जाता है ……


ग़ज़ल:
मदन मोहन सक्सेना  

ग़ज़ल

जिसे चाहा उसे छीना , जो पाया है सहेजा है
उम्र बीती है लेने में ,मगर फिर शून्यता क्यों हैं

सभी पाने को आतुर हैं ,नहीं कोई चाहता देना
देने में ख़ुशी जो है, कोई बिरला सीखता क्यों है

कहने को तो , आँखों से नजर आता सभी को है
अक्सर प्यार में ,मन से मुझे फिर दीखता क्यों है

दिल भी यार पागल है ,ना जाने दीन दुनिया को
दिल से दिल की बातों पर आखिर रीझता क्यों है

आबाजों की महफ़िल में दिल की कौन सुनता है
सही चुपचाप रहता है और झूठा चीखता क्यों है

ग़ज़ल :
मदन मोहन सक्सेना