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ग़ज़ल ( शायद दर्द से अपने रिश्ते पुराने लगते हैं)

वो हर बात को मेरी क्यों दबाने लगते हैं
जब हक़ीकत हम उनको समझाने लगते हैं

जिस गलती पर हमको वो समझाने लगते है
उस गलती को फिर क्यों दोहराने लगते हैं

दर्द आज खिंच कर मेरे पास आने लगते हैं
शायद दर्द से अपने रिश्ते पुराने लगते हैं

क्यों मुहब्बत के गज़ब अब फ़साने लगते हैं
आज जरुरत पर रिश्तें लोग बनाने लागतें हैं

दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने लगते हैं
मदन दुश्मन आज सारे जाने पहचाने लगते हैं

ग़ज़ल ( शायद दर्द से अपने रिश्ते पुराने लगते हैं)
मदन मोहन सक्सेना

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संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

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पाने को आतुर रहतें हैं खोने को तैयार नहीं है
जिम्मेदारी ने मुहँ मोड़ा ,सुबिधाओं की जीत हो रही

साझा करने को ना मिलता , अपने गम में ग़मगीन हैं
स्वार्थ दिखा जिसमें भी यारों उससे केवल प्रीत हो रही

कहने का मतलब होता था ,अब ये बात पुरानी है
जैसा देखा बैसी बातें .जग की अब ये रीत हो रही

अब खेलों में है राजनीति और राजनीति ब्यापार हुई
मुश्किल अब है मालूम होना ,किस से किसकी मीत हो रही

क्यों अनजानापन लगता है अब, खुद के आज बसेरे में
संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

संग साथ की हार हुई और तन्हाई की जीत हो रही

मदन मोहन सक्सेना

घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

जालिम लगी दुनियाँ हमें हर शख्श बेगाना लगा
हर पल हमें धोखे मिले अपने ही ऐतबार से

नफरत से की गयी चोट से हर जख़्म हमने सह लिया
घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

प्यार के एहसास से जब जब रहे हम बेखबर
तब तब लगा हमको की हम जी रहे बेकार से

इजहार राजे दिल का वो जिस रोज मिल करने लगे
उस रोज से हम पा रहे खुशबु भी देखो खार से

प्यार से सबसे मिलो ये चार पल की जिंदगी है
मजा पाने लगा है अब ये मदन प्यार में तकरार से

घायल हुए उस रोज हम जिस रोज मारा प्यार से

मदन मोहन सक्सेना

जिंदगी तुम हो हमारी और तुम से जिंदगी है

जानकर अपना तुम्हें हम हो गए अनजान खुद से
दर्द है क्यों अब तलक अपना हमें माना नहीं नहीं है

अब सुबह से शाम तक बस नाम तेरा है लबों पर
साथ हो अपना तुम्हारा और कुछ पाना नहीं है

गर कहोगी रात को दिन दिन लिखा बोला करेंगे
गीत जो तुमको ना भाए वह हमें गाना नहीं है

गर खुदा भी रूठ जाये तो मुझे मंजूर होगा
पास वह अपने बुलाये तो हमें जाना नहीं है

जिंदगी तुम हो हमारी और तुम से जिंदगी है
ये भला किसको बतायें और कुछ पाना नहीं है

जिंदगी तुम हो हमारी और तुम से जिंदगी है

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मदन मोहन सक्सेना

भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं

किसको आज फुर्सत है किसी की बात सुनने की
अपने ख्बाबों और ख़यालों में सभी मशगूल दिखतें हैं

सबक क्या क्या सिखाता है जीबन का सफ़र यारों
मुश्किल में बहुत मुश्किल से अपने दोस्त दिखतें हैं

क्यों सच्ची और दिल की बात ख़बरों में नहीं दिखती
नहीं लेना हक़ीक़त से क्यों मन से आज लिखतें हैं

धर्म देखो कर्म देखो अब असर दीखता है पैसों का
भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं

सियासत में न इज्ज़त की ,न मेहनत की कद्र यारों
सुहाने स्वप्न और ज़ज्बात यहाँ हर रोज बिकते हैं

दुनिया में जिधर देखो हज़ारों रास्ते दीखते
मंजिल जिनसे मिल जाये बह रास्ते नहीं मिलते

भरोसा हो तो किस पर हो सभी इक जैसे दिखतें हैं

मदन मोहन सक्सेना

दूर रह कर हमेशा हुए फासले

दूर रह कर हमेशा हुए फासले ,चाहें रिश्तें कितने क़रीबी क्यों ना हों
कर लिए बहुत काम लेन देन के ,विन मतलब कभी तो जाया करो

पद पैसे की इच्छा बुरी तो नहीं मार डालो जमीर कहाँ ये सही
जैसा देखेंगे बच्चे वही सीखेंगें ,पैर अपने माँ बाप के भी दबाया करो

काला कौआ भी है काली कोयल भी है ,कोयल सभी को भाती क्यों है
सुकूँ दे चैन दे दिल को ,अपने मुहँ में ऐसे ही अल्फ़ाज़ लाया करो

जब सँघर्ष है तब ही मँजिल मिले ,सब कुछ सुबिधा नहीं यार जीबन में है
जिस गली जिस शहर में चला सीखना , दर्द उसके मिटाने भी जाया करो

यार जो भी करो तुम सँभल करो , सर उठे गर्व से ना झुके शर्म से
वक़्त रुकता है किसके लिए ये “मदन” वक़्त ऐसे ही अपना ना जाया करो

दूर रह कर हमेशा हुए फासले1064223796

मदन मोहन सक्सेना

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है

जिंदगी ने जिस तरह हैरान हमको कर रक्खा है
मन कभी करता है मेरा जिंदगी की जान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
पूजते पत्थर जहाँ में, मैं पत्थरों की शान ले लूँ

हसरतें पूरी हो जव तो खूब भाती जिंदगी है
ख्वाव दिल में पल रहे शख्श के अरमान ले लूँ

प्यार की बोली लगी है अब आज के इस दौर में
प्यार पाने के लिए क्या कीमती सामान ले लूँ

हर कोई अपनी तरह से यार जीवन जी रहा है
जानकर इसको “मदन “जिंदगी का गान ले लूँ

दिल लगाकर कव किसी को चैन यारों मिल सका है
मदन मोहन सक्सेना